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Saturday, June 14, 2014

आत्मभाव    किसी विशेष वार्तालाप की प्रतिक्रिया  के परिणामस्वरूप 

"मुझे हमेशा अपने निर्णय पर संतोष होता है कि इतना पढ़ा-लिखा फिर भी प्राइवेट सेक्टर में हूँ ,स्वतन्त्र पत्रकार हूँ।  कम से कम ये स्थिति तो नही ही है कि  दूसरों की आज्ञा की अवपालना के लिए आजीविका को बचाने का संकट झेलना पड़े ,नेताओं के आगे -पीछे दौड़ना पड़े ,अधिकारियों से सम्पर्क साधने के लिए चक्कर काटने पड़ें ; और तो और उनकी चापलूसी कर अपनी नौकरी बचाते रहने का दंश झेलना पड़े।  जहाँ भी हूँ स्वतन्त्र हूँ ,स्वेच्छा से हूँ ,सही हूँ । अपनी मेहनत से कमाता हूँ और सम्मानजनक स्थिति में रहता हूँ,स्वयं से प्रेम कत्तई नहीं करता परन्तु अपने से ज्यादा विश्वास किसी पे नहीं करता। आईने में अपनी आँख से आँख मिला के कह सकता हूँ कि मैं  खुद्दार हूँ ,ख़ुदग़र्ज़  नहीं ! "
 विकारहेतौ सति विक्रियन्ते येषान्न चेतांसि त एव धीराः।  अर्थात् जो बातें विकार पैदा करने वाली हैं उनके होते हुए भी जिनके मन में विकार न पैदा हो वे धीर हैं , धीरज हैं। 
(कुमारसम्भवे कालिदासः)
      कृपाकांक्षी 
डॉ. धीरेन्द्र नाथ मिश्र 'धीरज'

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