Pages

Thursday, June 26, 2014

तुझसे मैं तब भी पूछता था और आज भी ,
क्यों नहीं आया मुखौटे में जीना तुम्हे ?
क्यों अपनी शर्तों पे जीते रहे तुम ?
क्यों खुशी देकर गरल पीते रहे तुम ?
क्यों घर में ही विद्रोही बन गए ?
तुम गलत नहीं हो इस पर अड़ गए ,
सिद्धान्तों पे चलकर क्या पाया तुमने ?
लोगों ने तुम्हारा प्रयोग किया और चलते बने ,
क्यों नहीं सोचा कि तुम्हारी भी अपनी  ज़िन्दगी है ?
दूसरों के लिए जीना हमेशा सही नही होता ,
कभी स्वयं से स्नेह करके देखो ,
ज़िन्दगी कैसी लगती है ?
कैसे खुशनुमा हो जाता है ?
इस  धरती का सारा मंज़र ,
कब तक  बने रहोगे यायावर ?

अन्तिम पाँच पंक्तियाँ परमादरणीय जी की प्रेरणा से


No comments:

Post a Comment