तुझसे मैं तब भी पूछता था और आज भी ,
क्यों नहीं आया मुखौटे में जीना तुम्हे ?
क्यों अपनी शर्तों पे जीते रहे तुम ?
क्यों खुशी देकर गरल पीते रहे तुम ?
क्यों घर में ही विद्रोही बन गए ?
तुम गलत नहीं हो इस पर अड़ गए ,
सिद्धान्तों पे चलकर क्या पाया तुमने ?
लोगों ने तुम्हारा प्रयोग किया और चलते बने ,
क्यों नहीं सोचा कि तुम्हारी भी अपनी ज़िन्दगी है ?
दूसरों के लिए जीना हमेशा सही नही होता ,
कभी स्वयं से स्नेह करके देखो ,
ज़िन्दगी कैसी लगती है ?
कैसे खुशनुमा हो जाता है ?
इस धरती का सारा मंज़र ,
कब तक बने रहोगे यायावर ?
अन्तिम पाँच पंक्तियाँ परमादरणीय जी की प्रेरणा से
क्यों नहीं आया मुखौटे में जीना तुम्हे ?
क्यों अपनी शर्तों पे जीते रहे तुम ?
क्यों खुशी देकर गरल पीते रहे तुम ?
क्यों घर में ही विद्रोही बन गए ?
तुम गलत नहीं हो इस पर अड़ गए ,
सिद्धान्तों पे चलकर क्या पाया तुमने ?
लोगों ने तुम्हारा प्रयोग किया और चलते बने ,
क्यों नहीं सोचा कि तुम्हारी भी अपनी ज़िन्दगी है ?
दूसरों के लिए जीना हमेशा सही नही होता ,
कभी स्वयं से स्नेह करके देखो ,
ज़िन्दगी कैसी लगती है ?
कैसे खुशनुमा हो जाता है ?
इस धरती का सारा मंज़र ,
कब तक बने रहोगे यायावर ?
अन्तिम पाँच पंक्तियाँ परमादरणीय जी की प्रेरणा से
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