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Wednesday, September 4, 2013

कभी हँसाते  कभी रुलाते क्या क्या रूप  दिखाते रिश्ते ,
कभी फूल सा प्यार कभी ये काँटे  बन चुभ जाते रिश्ते ,
सम्बोधन  बेकार हो गये ,
बेमानी सब  प्यार हो गये ,
माली  ही जब बगिया लूटे ,
रिश्ते सब व्यापार हो गये ,
अहसासों की पंखुड़ियों पर पत्थर रोज चलाते  रिश्ते ,
कोई खोज रहा है सूरत ,
कोई खोज रहा है मूरत ,
किसको हम हमदर्द बतायें ,
सबको छलती यहाँ मुहब्बत ,
कुटियों की रौशनी छीनकर अपना महल सजाते रिश्ते ,
हर आँसू हम पी  सकते हैं ,
मरुस्थल में  जी सकते हैं ,
दुःख  में यदि जीना आ जाए ,
घावों को हम सी सकते हैं ,
पतझर में भी गुलिस्ताँ मुस्कराता ,
जब -जब प्यार लुटाते  रिश्ते ,
कभी हँसाते  कभी रुलाते क्या क्या रूप  दिखाते रिश्ते ,


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