बक्श दे ऐ खुदा इस सफ़र के लिए;
खुशनुमा कुछ नज़ारे नज़र के लिए ;
ठण्ड में जो ठिठुरता है नंगे बदन ;
उसको चादर तो दे दो बसर के लिए;
कैफियत है गुनाहों की दिल में मगर ;
जैसे उल्लू हो एक खंडहर के लिए;
इस सियासत के वहशी मकडजाल जाल में ;
फँस गया आदमी उम्र भर के लिए;
ये न पूँछो कि क्या कुछ गँवाया गया;
इस उठे सर और सीधी कमर के लिए................

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