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Wednesday, March 11, 2015

नया मीडिया मंच का कारवां १७ नवम्बर २०१३ को देवरिया से प्रारम्भ होकर  क्रमशः इलाहाबाद ,गोरखपुर के बाद राजधानी लखनऊ पहुँच रहा है।  लखनऊ टीम ने इस विषय में एक बैठक कर कार्यक्रम के आयोजन आदि पर विमर्श भी किया।  केंद्रीय टीम  के साथ भाई  के आदेशानुसार मैं भी लखनऊ पहुँच रहा हूँ।  इस बार का कार्यक्रम कई मायनो में खास है।  भाई  जी का संयोजन ,अग्रज श्री  का संरक्षण तथा  आदि का आगमन कार्यक्रम को और शानदार बना रहा है।  आप भी आइये ,कार्यक्रम आपका ही है ,आपसे ही सम्बन्धित है। विस्तृत विवरण एवं  सादर आमन्त्रण संलग्न है। 

Saturday, February 7, 2015

रमण महर्षि अपना शरीर छोड़ रहे थे तभी उनके एक शिष्य ने रोना चीखना शुरू कर दिया ,रमण ने अपने नेत्र खोले और कहा , "क्या कारण है? तुम क्यों रो रहे हो ?" शिष्य ने कहा ,"भगवन् ! आप हमें छोड़कर जा रहे हैं यह असह्य  है। "  उस समय यद्यपि महर्षि रमण गले के कैंसर से पीड़ित थे और अत्यन्त पीड़ा का अनुभव कर रहे थे ,उनके लिए कुछ भी बोलना दुष्कर था फिर भी वह हँसे उन्होंने कहा ,"मैं कहाँ जा सकता हूँ ? मैं यहां उतना ही अधिक बना रहूँगा जितना कि अभी हूँ। तुम्हीं बताओ मुझे इस स्थान में कोई जगह ऐसी है जहाँ जाना हो ,यहाँ से कहीं भी तो नही जाना है।  मैं कैसे मर सकता हूँ ? जो मर सकता था (अहंकार ) वह पहले ही चला गया है।  यदि तुमने वास्तव में अपने हृदय में मुझे उतना स्थान दिया है तो हमेशा मैं पहले जितना ही बना रहूँगा। " चेतन कभी नही मरता …………… कभी भी नही …………… 

Friday, February 6, 2015

समुद्र की कभी मृत्यु नही होती ,केवल उठती-गिरती शोर मचाती लहरें आती हैं और चली जाती हैं।  एक बार भी लहर अगर ये सोच ले कि वह सागर से पृथक है तो उसे अतीव व्यग्रता होगी कि मृत्यु आ रही है ,वह आ रही है और रास्ते में है।  परन्तु जब वह यह जान ले कि मैं सागर से पृथक नही हूँ ,मै कैसे मर सकती हूँ ?  मरने के लिए मुझे पृथक होना पड़ेगा।  यदि मैं सागर के साथ हो जाऊं फिर मैं लहर जैसा रहूँ या नही क्या फर्क पड़ता है क्यूंकि जो मेरे अन्दर है वह भी तो सागर ही है और इसका अस्तित्व मेरे न रहने पर भी रहेगा।  ठीक यहीं स्थिति मृत्यु की है जो हमें हमारे अस्तित्व के दर्शन कराती है। 

Monday, November 17, 2014

जन्मदिवस पर आप सबके आशीर्वाद ,स्नेह ,शुभकामनाओं के लिए हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ ,अभिभूत हूँ आप सबसे मिले स्नेह से।  सदैव ये प्रयास रहेगा कि अपनी लेखनी ,कर्म के द्वारा आप सबकी उम्मीदों पर खरा उतरता रहूँ ,माँ भारती की सेवा करता रहूँ। मन ,वचन ,कर्म से किसी का अहित न करूँ ऐसा ताउम्र प्रयास रहेगा।  वन्दे मातरंम् ! जय माँ भारती !!


Saturday, November 1, 2014

अत्यन्त  हर्ष का विषय है कि  हमारा नया मीडिया मंच अपने दो पड़ावों को  सफलतापूर्वक पार  करते हुए अपने तीसरे पड़ाव की ओर  अग्रसर है ,हमारा अगला पड़ाव गोरखपुर की पावन जमीन है  भाई शिवानन्द जी ,आदरणीय डॉ सौरभ मालवीय जी ,पृथक जी  आदि के प्रयासों से हम नया मीडिया मंच को उत्तरोत्तर सफल व सशक्त बनाने की दिशा में अग्रसर हैं।  कल शिवा भाई से वार्ता के बाद आज ये सूचना मिली है की हमारा अगला पड़ाव 'पटना' होगा कार्यक्रम का प्रस्तावित विषय है  'नया मीडिया एवं वेब पुलिसिंग' कार्यक्रम आयोजित करने  के लिए आमन्त्रण इस बार वहां के अपर पुलिस महानिदेशक महोदय की तरफ से है।  आप सबसे भी सादर अनुरोध है की नया मीडिया मंच से जुड़ें ,गोरखपुर में आयोजित होने वाली संगोष्ठी में जुड़ें और हमारे इरादों को मजबूती प्रदान करें। 

सादर। 
डॉ.धीरेन्द्र नाथ मिश्र 'धीरज'

Tuesday, August 12, 2014

मात्र दो प्रज्ञाचक्षु युक्त व्यक्ति ही सदैव एक -दूसरे से अन्तर्संवाद स्थापित  करते हुए साथ रह सकते हैं ,इनमे एक नए तरह के प्रेम का उदय होता है जिसे आप मित्रता कह सकते हैं।  इस तथाकथित प्रेम में मित्रता अधिक गरिमामयी होती है ,इस प्रेम में घृणा ,संघर्ष ,लड़ना ,झगड़ना सब समाप्त हो जाता है ;अधिकार और आत्मनियंत्रण की कामना बलवती हो जाती है।  'मित्रता शुद्धतम प्रेम है।' इसमें जो कुछ  भी असार ,अर्थहीन होता है पीछे छूट जाता है केवल सारभूत और सुवास ही शेष बचता है।
              मित्रता ,प्रेम की ही सुवास है। स्मरण रहे जब तक आप अपने जीवनसाथी के मित्र नही बन जाते कभी भी शांति और समरसता का भान नही कर पाएंगे। 

Sunday, August 3, 2014

पता नही किस उद्वेग और आक्रोश से इस काव्य का सृजन हुआ है ये तो  नही बता सकता परन्तु इतना जरूर है कि  थोड़ा भी  सहृदय व्यक्ति इस काव्यकृति से अंतर्मन तक हिल जायेगा हम जैसे न जाने कितनों की आवाज इस काव्य में सुनाई दे रही है ,आप जिसे मिल गए उसे सोने /चांदी की कोई जरुरत ही नही फिर भी नतशीश नमन करता हूँ मैं मातृसत्ता को जिसने आपकी सहचरी बनकर आपके सभी निर्णयों में न केवल स्वीकारोक्ति दी वरन मनसा ,वाचा ,कर्मणा आपकी सहभागी बनी रहीं ,आप जैसे 'ज़मीर' कई युगों में एक पैदा होते हैं और जिसका जीवन ही स्वयं का नही है औरों के लिए है उसका जीना है तो जीना है इस संसार में।

मुसीबत की क्या बिसात आपके सामने आये ,
मुश्किल में इतना तेज ही नही की टिक पाये ,
मानता हूँ कि जो छपते  हैं वही बिकते हैं ज़माने में  ,
कलम भी सोचती है कि ज़मीर पे क्या लिख पाये ,
भारत माँ भी नाज़ करती है अपने ऐसे सपूत पर ,
वो भी चाहती है कि कहीं कोई तो ज़मीर आये।




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